दूरभाष के दर्शन से काल हुआ उजियारा,
प्रज्वल हुआ धुयाँ अमोघ पहले खाली पनियारा
ना हुआ तो फिर किया मन ना अभी हारा,
शिथिल हुआ पर थमा नहीं यही हैं जग सारा
साम दाम दंड भेद लगा दिया अब म्हारा,
सैन्य दौड़ की आड़ में छुपा लिया तन सारा
लगे बाँधने आसमान में ध्रुव को एक और तारा,
मोह को दिया त्याग ताकि बह सके धारा
धीमी गति के उफान पे एक उछाल मारा,
बाँध खुदको साध लिया उस काल सारा
प्रेरक बने संगी तो काल भी हारा,
निशा बनी संगनी उषा रण सारा
चारो पर चौथा हुआ बल मारा,
लत नहीं यह हैं दिनचर्य हमारा
बाकी तीनो को अभी नहीं संवारा ||